लेकिन ये लोकसभा सीट तब से चर्चा में है जबसे यहां से जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार के चुनाव लड़ने की ख़बरें आई थीं.
एक समय ऐसा आया जब ख़बरें आईं कि बेगूसराय में वह महागठबंधन के उम्मीदवार हो सकते हैं.
लेकिन महागठबंधन और कन्हैया की पार्टी सीपीआई के बीच दाल नहीं गली.
इसके बाद वह सीपीआई उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरे और महागठबंधन ने इसी सीट पर दिग्गज राजद नेता तनवीर हसन को टिकट दिया.
बीबीसी ने तनवीर हसन के साथ ख़ास बातचीत में इस सीट के जातिगत समीकरण और राजनीतिक भविष्य से जुड़े सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की है.
बेगूसराय लोकसभा सीट इतनी चर्चा में क्यों है?
देखिए, मीडिया ही किसी सीट को चर्चा में लाता है और उसे चर्चा से गायब भी कर देता है. मीडिया ऊपर से ही इस सीट को चर्चा में बनाए हुए है. चुनाव के दौरान तो हर सीट चर्चा में होती है. हर जगह चुनाव का संघर्ष है. बेगुसराय के मामले में बस इतना ही कहा जा सकता है कि यहां 2014 के चुनाव में संघर्ष किया गया था. स्थिति बिलकुल ऐसी ही थी.
क्या कन्हैया कुमार ने आपकी नींद उड़ा दी है?
हमारी नींद न कन्हैया ने उड़ाई है और न किसी और ने उड़ाई है. 2014 के चुनाव में भी हमने संघर्ष किया था. चुनाव में तो काम करना ही पड़ता है. तब कन्हैया नहीं थे लेकिन उनकी पार्टी के उम्मीदवार तो तब भी थे. ऐसे में कन्हैया रहें या पार्टी का दूसरा उम्मीदवार रहे, लड़ाई तो समान है. कन्हैया के नाम पर उनके समर्थकों वाले मतदान का अनुमान कम है. क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टी अपने बेस वोट पर चुनाव लड़ रही है और यही वोट उन्हें पिछले चुनाव में भी मिला था.
बीते पांच सालों से केंद्र में एक मजबूत सरकार है, वहां जब विपक्ष की आवाज़ दबती हुई दिखाई दी तो एक युवा ने अपनी आवाज़ से इस तरह मोर्चा लेकर रखा. उस आवाज़ को आप लोगों ने खुद से अलग क्यों कर दिया?
हमनें इस आवाज़ को अपने आप से अलग नहीं किया. गठबंधन की बुनियाद पिछले चुनाव में मिले हुए मतों के आधार पर बनती है. सीट का बंटवारा भी उसी तरह होता है. जब हमारे गठबंधन मे ये तय हुआ कि राजद का इस सीट पर क्लेम है. कम्युनिस्ट पार्टी इस सीट पर तीसरे नंबर पर आई थी. राजद से दो लाख वोट कम मिले थे. इस बुनियाद पर ये सीट राजद की बनती है और राजद लड़ेगी.
साझा चुनाव तो यहां पर हुआ नहीं. उन्होंने सभी जगहों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं. अब पिछले चुनाव में भी वह साझा नहीं थे और जदयू से मिले हुए थे. इस वजह से भी स्थानीय राजनीति में उनकी मंशा ठीक नहीं रहती है.
तीसरी बात ये है कि मीडिया के द्वारा सिर्फ ये सवाल क्यों है कि वो क्यों नहीं लड़े और वो क्यों नहीं लड़ सकते थे, वो क्यों हटाए गए. ये तो बेहद पक्षपातपूर्ण सवाल है.
एक मजबूत सरकार में जब विपक्ष की आवाज़ कमज़ोर पड़ रही थी तो एक युवा ने उस आवाज़ को मजबूत करने की कोशिश की. बस इसी वजह से ये सवाल पूछा जाता है.
नहीं, विपक्ष की आवाज़ मजबूत करने की कोई कोशिश नहीं की गई. विपक्ष भी गूंगा नहीं था. विपक्ष ने अपने धर्म को निभाया था. ये एक विवादास्पद मामले में चर्चा में आए और उसी मामले से मीडिया ने इन्हें कैच किया. मीडिया पता नहीं क्यों कुछ पहचानी शक्लों को ही प्रोजेक्ट करता है.
मैंने सही तब भी नहीं माना था. तब भी इसकी निंदा की थी. लेकिन सवाल ये नहीं है. सवाल ये है कि कुछ न कुछ विवाद हुआ तब न मीडिया ने उसको हाईलाइट किया. मीडिया ने उनके पक्ष और विपक्ष दोनों में उनको हाईलाइट किया. ऐसे में हाईलाइट का केंद्र तो वही बने. मतलब यही वजह बनी.
अब तो अरुण जेटली भी टुकड़े-टुकड़े गैंग कहते हैं. क्या आप भी टुकड़े-टुकड़े गैंग का जो दाग या आरोप है, उसे आप सही मानते हैं?
टुकड़े-टुकड़े गैंग है या क्या है, जेटली के आरोप को सही मानना या न मानना अलग चीज़ है. हमारी मान्यता ये है कि अगर किसी भी तरह के ऐसे मामले में बीजेपी सरकार पक्षपात करती है और राष्ट्रद्रोह और राष्ट्रप्रेम का सर्टिफ़िकेट बांटती है तो इसका हक़ उन्हें नहीं है.
आपको नहीं लगता है कि कन्हैया भी उसी वोटबैंक को अपील कर रहे हैं जिस वोट बैंक को आप अपील कर रहे हैं.
उनका भी काम है अपील करना. अभी तक उनकी अपील पर जब फॉलोइंग हो जाएगी तब न उसको देखा जाएगा. अभी तक उसकी फॉलोइंग नज़र नहीं आती है.
अब इसके लिए दोषी कौन हो सकता है. मैं तो नहीं हूं. पार्टी के पिछले प्रदर्शन के आधार पर मुझे उम्मीदवार बनाया गया. इस पर कोशिश की जा सकती है. लेकिन उन्होंने सशर्त कोशिश की कि ये चाहिए और वो चाहिए. ऐसी हालत में गठबंधन के दूसरे अन्य घटकों का रुख अलग था जिनसे वो लोग सहमत नहीं हुए.
क्या आप ये स्वीकार करते हैं कि आपके और कन्हैया के अलग होने से गिरिराज खेमे में खुशी है?
चुनाव हम भी लड़ रहे हैं और वह भी लड़ रहे हैं. ऐसे में किसके यहां खुशी है और किसके यहां ग़म है, वो अलग बात है. ये तो एक धारणा की बात है कि कहां खुशी है. और, कौन जीतेगा तो पाकिस्तान में फुलझड़ी छूटेगी. ये तो धारणा की बात है. और इसी के आधार पर ये सब कहा जा रहा है.
आपका दुश्मन गिरिराज और कन्हैया में से कौन है तनवीर जी? क्योंकि गिरिराज, कन्हैया और आपकी अपनी विचारधारा है, ऐसे में कौन सी विचारधारा आपके ख़िलाफ़ है?
आप यही तो पूछेंगे न कि जब आप दोनों एक विचारधारा के आस-पास हैं तो साथ क्यों नहीं हुए. क्योंकि आप बार बार एक ही जैसा सवाल पूछ रहे हैं.
नहीं, ऐसा नहीं है, क्योंकि आपके मतदाताओं को कहीं न कहीं लगता है कि कुछ गड़बड़ हुआ है.
ये तो हमें भी लगता है कि देशभर में बड़े पैमाने पर जो मोर्चेबाजी होनी चाहिए थी, उसमें कहीं न कहीं चूक हुई है. लेकिन बिहार की मोर्चेबाजी में हमारे मोर्चे के साथ जो घटक हैं, उनके साथ एक बड़ा आकार है. और यही बात साबित करती है कि बिहार में ये चूक नहीं हुई है.
और व्यापकता लाने के लिए कहीं न कहीं समझौता करने की भी ज़रूरत होती है. ऐसे में जब वामपंथ ने सब मिलाकर 16-17 सीट पर दावेदारी की तो वो कहीं से मुनासिब नहीं था. और वो उस दावेदारी पर अड़े रहे. ऐसी हालत में आप बताइए कि कौन से गठबंधन में ऐसी शर्त पर दावेदारी मान ली जाए जिससे कि किसी एक व्यक्ति के लिए पूरी पार्टी कहे कि वो सीट तो वह ही लेगी.
और अगर मान भी लिया जाए कि हो जाती तो उस समय तो कोशिश की नहीं गई. उनकी तरफ़ से कोशिश नहीं की गई. हमारी तरफ़ से कोशिश की गई. हमने ऑफ़र भी की. हमने माले के लिए एक सीट छोड़ी भी. क्योंकि जनसमर्थन के लिहाज़ से जो उपयुक्त पार्टी है वो माले है और उसका कहीं कहीं जनसमर्थन है. हमने अपने आप से उनके लिए सीट छोड़ दिया.
Wednesday, April 24, 2019
Thursday, April 18, 2019
लोकसभा चुनाव 2019: पीएम मोदी की जाति सवर्ण से बनी थी ओबीसी?
कांग्रेस पर निशाना साधते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर ख़ुद को पिछड़ी जाति का बताया है.
महाराष्ट्र के सोलापुर में एक रैली के दौरान मोदी ने कहा कि 'पिछड़ा वर्ग की वजह से उन्हें निशाना बनाया जा रहा है.'
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के 'चौकीदार चोर है' और 'सभी चोरों का सरनेम मोदी है' जैसे बयानों को लेकर मोदी ने कहा, "पिछड़ा होने की वजह से, हम पिछड़ों को अनेक बार ऐसी परेशानियां झेलनी पड़ी हैं. अनेक बार कांग्रेस और उसके साथियों ने मेरी हैसियत बताने वाली, मेरी जाति बताने वाली बातें कही हैं."
मोदी ने कहा, "कांग्रेस के नामदार ने पहले चौकीदारों को चोर कहा, जब ये चला नहीं तो अब कह रहे हैं कि जिसका भी नाम मोदी है वो सारे चोर क्यों हैं?"
उन्होंने कहा, "लेकिन वो इस बार इससे भी आगे बढ़ गए हैं और पूरे पिछड़े समाज को ही चोर कहने लगे हैं."
2014 में जब पहली बार नरेंद्र मोदी ने ख़ुद को पिछड़ा वर्ग का बताया था तो इस पर ख़ासा विवाद हुआ था.
तब कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि मोदी ने सत्ता में आने के बाद अपनी जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल करा दिया था.
हालाँकि गुजरात सरकार ने सफ़ाई में कहा था कि घांची समाज को 1994 से गुजरात में ओबीसी का दर्जा मिला हुआ है. नरेंद्र मोदी इसी घांची जाति के हैं.
गुजरात कांग्रेस के नेता शक्ति सिंह गोहिल ने मोदी पर आरोप लगाया था कि वह पिछड़ी जाति के नही हैं.
गोहिल के अनुसार, मोदी 2001 में मुख्यमंत्री बने और राजनीतिक लाभ लेने के लिए 2002 में अपनी जाति को पिछड़ी जाति में डाल दिया.
गोहिल ने गुजरात सरकार के 2002 के एक सर्कुलर का हवाला देते हुए आरोप लगाया था कि मोदी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी जाति को ओबीसी श्रेणी में शामिल कराने के लिए जोड़तोड़ की थी.
उस समय गोहिल ने बीबीसी को बताया था कि उन्होंने यह पता लगाने के लिए एक आरटीआई याचिका दायर की थी कि घांची जाति को राज्य की ओबीसी सूची में कब लाया गया था.
गोहिल के अनुसार, "मोदी गुजरात राज्य के अमीर और समृद्ध मोढ घांची जाति से हैं. इस बिरादरी को मोदी के मुख्यमंत्री बनने से पहले ओबीसी सूची में कभी शामिल नहीं किया गया था."
गोहिल के मुताबिक, "मोदी ने गुजरात सरकार की व्यवस्था को अपने फ़ायदे के लिए बदला है. मोढ घांची समाज को ओबीसी सूची में डालने की कभी कोई मांग नही थीं पर ख़ुद को पिछड़ी जाति का बताकर वोट बैंक की पॉलिटिक्स कर सकें इसलिए उन्होने ख़ुद को पिछड़ा बना दिया."
बीबीसी हिंदी के पास एक जनवरी, 2002 को गुजरात सरकार की ओर से जारी किया गया वह पत्र है जिसमें मोढ घांची को ओबीसी सूची में शामिल करने की घोषणा की गई थी.
कांग्रेस के आरोप के जवाब में गुजरात सरकार ने दो दशक पुरानी एक अधिसूचना का ज़िक्र किया जो कहती है कि मोढ घांची (तेली) जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया है.
राज्य सरकार के प्रवक्ता नितिन पटेल के मुताबिक, "गुजरात सरकार के समाज कल्याण विभाग ने 25 जुलाई 1994 को एक अधिसूचना जारी की थी जो 36 जातियों को ओबीसी श्रेणी में शामिल करती थी और इसमें संख्या 25 (ब) में मोढ घांची जाति का ज़िक्र है, इस जाति को ओबीसी में शामिल किया गया है."
कौन हैं मोढ घांची?
घांची जिन्हें अन्य राज्यों में साहू या तेली के नाम से जाना जाता है. ये पुश्तैनी तौर पर खाद्य तेल का व्यापार करने वाले लोग हैं. गुजरात में हिंदू और मुस्लिम दो धर्मों को मानने वाले घांची हैं.
इनमें से उत्तर पूर्वी गुजरात में मोढेरा से ताल्लुक रखने वालों को मोढ घांची कहा जाता है. गुजरात के गोधरा हत्याकांड में पकड़े गए ज़्यादातर लोग घांची मुसलमान थे.
जाने-माने सामाज विज्ञानी अच्युत याग्निक का कहना है कि 'यह कहना ग़लत होगा कि मोदी एक फ़र्ज़ी ओबीसी हैं.'
उन्होंने कहा, "कांग्रेस का आरोप इसलिए ग़लत है क्योंकि घांची हमेशा से ही ओबीसी सूची में आते हैं. मोदी जिस जाति से हैं वह घांची की ही एक उपजाति है. इसलिए वह ओबीसी सूची में कहलाएँगे."
घनश्याम शाह ने कहा, "गुजरात में घांची समाज राज्य के सभी हिस्सों में फैला हुआ है. इसका एक हिस्सा मोढेरा सूर्य मंदिर के आस-पास के इलाकों में है जिसे मोढ घांची कहते हैं."
पर सवाल यह है कि अगर मोदी की जाति ओबीसी सूची में आती थी तो फिर सरकार ने 2002 में यह परिपत्र क्यों जारी किया?
अपना नाम दिए जाने से इनकार करते हुए गुजरात सरकार के एक सीनियर अधिकारी ने बीबीसी हिंदी को बताया था, "समस्या यह थी कि जब घांची समाज को ओबीसी सूची में डाला तब उसकी सभी उपजाति को भी उसमें शामिल कर देना चाहिए था. पर ऐसा नही हुआ. इसलिए गुजारत सरकार ने एक नया परिपत्र जारी करके मोढ घांची का उसमें शामिल कर लिया."
महाराष्ट्र के सोलापुर में एक रैली के दौरान मोदी ने कहा कि 'पिछड़ा वर्ग की वजह से उन्हें निशाना बनाया जा रहा है.'
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के 'चौकीदार चोर है' और 'सभी चोरों का सरनेम मोदी है' जैसे बयानों को लेकर मोदी ने कहा, "पिछड़ा होने की वजह से, हम पिछड़ों को अनेक बार ऐसी परेशानियां झेलनी पड़ी हैं. अनेक बार कांग्रेस और उसके साथियों ने मेरी हैसियत बताने वाली, मेरी जाति बताने वाली बातें कही हैं."
मोदी ने कहा, "कांग्रेस के नामदार ने पहले चौकीदारों को चोर कहा, जब ये चला नहीं तो अब कह रहे हैं कि जिसका भी नाम मोदी है वो सारे चोर क्यों हैं?"
उन्होंने कहा, "लेकिन वो इस बार इससे भी आगे बढ़ गए हैं और पूरे पिछड़े समाज को ही चोर कहने लगे हैं."
2014 में जब पहली बार नरेंद्र मोदी ने ख़ुद को पिछड़ा वर्ग का बताया था तो इस पर ख़ासा विवाद हुआ था.
तब कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि मोदी ने सत्ता में आने के बाद अपनी जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल करा दिया था.
हालाँकि गुजरात सरकार ने सफ़ाई में कहा था कि घांची समाज को 1994 से गुजरात में ओबीसी का दर्जा मिला हुआ है. नरेंद्र मोदी इसी घांची जाति के हैं.
गुजरात कांग्रेस के नेता शक्ति सिंह गोहिल ने मोदी पर आरोप लगाया था कि वह पिछड़ी जाति के नही हैं.
गोहिल के अनुसार, मोदी 2001 में मुख्यमंत्री बने और राजनीतिक लाभ लेने के लिए 2002 में अपनी जाति को पिछड़ी जाति में डाल दिया.
गोहिल ने गुजरात सरकार के 2002 के एक सर्कुलर का हवाला देते हुए आरोप लगाया था कि मोदी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी जाति को ओबीसी श्रेणी में शामिल कराने के लिए जोड़तोड़ की थी.
उस समय गोहिल ने बीबीसी को बताया था कि उन्होंने यह पता लगाने के लिए एक आरटीआई याचिका दायर की थी कि घांची जाति को राज्य की ओबीसी सूची में कब लाया गया था.
गोहिल के अनुसार, "मोदी गुजरात राज्य के अमीर और समृद्ध मोढ घांची जाति से हैं. इस बिरादरी को मोदी के मुख्यमंत्री बनने से पहले ओबीसी सूची में कभी शामिल नहीं किया गया था."
गोहिल के मुताबिक, "मोदी ने गुजरात सरकार की व्यवस्था को अपने फ़ायदे के लिए बदला है. मोढ घांची समाज को ओबीसी सूची में डालने की कभी कोई मांग नही थीं पर ख़ुद को पिछड़ी जाति का बताकर वोट बैंक की पॉलिटिक्स कर सकें इसलिए उन्होने ख़ुद को पिछड़ा बना दिया."
बीबीसी हिंदी के पास एक जनवरी, 2002 को गुजरात सरकार की ओर से जारी किया गया वह पत्र है जिसमें मोढ घांची को ओबीसी सूची में शामिल करने की घोषणा की गई थी.
कांग्रेस के आरोप के जवाब में गुजरात सरकार ने दो दशक पुरानी एक अधिसूचना का ज़िक्र किया जो कहती है कि मोढ घांची (तेली) जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया है.
राज्य सरकार के प्रवक्ता नितिन पटेल के मुताबिक, "गुजरात सरकार के समाज कल्याण विभाग ने 25 जुलाई 1994 को एक अधिसूचना जारी की थी जो 36 जातियों को ओबीसी श्रेणी में शामिल करती थी और इसमें संख्या 25 (ब) में मोढ घांची जाति का ज़िक्र है, इस जाति को ओबीसी में शामिल किया गया है."
कौन हैं मोढ घांची?
घांची जिन्हें अन्य राज्यों में साहू या तेली के नाम से जाना जाता है. ये पुश्तैनी तौर पर खाद्य तेल का व्यापार करने वाले लोग हैं. गुजरात में हिंदू और मुस्लिम दो धर्मों को मानने वाले घांची हैं.
इनमें से उत्तर पूर्वी गुजरात में मोढेरा से ताल्लुक रखने वालों को मोढ घांची कहा जाता है. गुजरात के गोधरा हत्याकांड में पकड़े गए ज़्यादातर लोग घांची मुसलमान थे.
जाने-माने सामाज विज्ञानी अच्युत याग्निक का कहना है कि 'यह कहना ग़लत होगा कि मोदी एक फ़र्ज़ी ओबीसी हैं.'
उन्होंने कहा, "कांग्रेस का आरोप इसलिए ग़लत है क्योंकि घांची हमेशा से ही ओबीसी सूची में आते हैं. मोदी जिस जाति से हैं वह घांची की ही एक उपजाति है. इसलिए वह ओबीसी सूची में कहलाएँगे."
घनश्याम शाह ने कहा, "गुजरात में घांची समाज राज्य के सभी हिस्सों में फैला हुआ है. इसका एक हिस्सा मोढेरा सूर्य मंदिर के आस-पास के इलाकों में है जिसे मोढ घांची कहते हैं."
पर सवाल यह है कि अगर मोदी की जाति ओबीसी सूची में आती थी तो फिर सरकार ने 2002 में यह परिपत्र क्यों जारी किया?
अपना नाम दिए जाने से इनकार करते हुए गुजरात सरकार के एक सीनियर अधिकारी ने बीबीसी हिंदी को बताया था, "समस्या यह थी कि जब घांची समाज को ओबीसी सूची में डाला तब उसकी सभी उपजाति को भी उसमें शामिल कर देना चाहिए था. पर ऐसा नही हुआ. इसलिए गुजारत सरकार ने एक नया परिपत्र जारी करके मोढ घांची का उसमें शामिल कर लिया."
Wednesday, April 10, 2019
电视真人秀,如何使卡戴珊姐妹成为百万富翁
美国一档真人秀节目《与卡戴珊同行》(Keeping Up with the Kardashians)最新的第16季开播,不仅意味着卡戴珊一家的日常喜怒哀乐将再次一览无余地展示给观众,而且也意味着卡戴珊姐妹的各种商品也将再次吸引顾客的眼线。
这档真人秀电视系列节目转眼已经开播10年有余,卡戴珊一家的财富也随之暴涨。
刚满21岁——节目开播时年仅9岁的卡戴珊家小妹凯莉•詹娜( Kylie Jenner )竟然跻身亿万富翁行列。
根据《福布斯杂志》公布的信息,凯莉身价已达10亿美元,成为真人秀明星卡戴珊家族中首富,而她的姐妹们也并不落魄,借着这档真人秀的东风,她们个个都已身家百万。
在一个追求网红的时代,卡戴珊姐妹利用电视和网络的影响竭力发展商业王国,显然她们成功了。卡戴珊姐妹在网络上的粉丝加在一起共有5.37亿之多,她们的影响力促进了她们各自商业王国的拓展和繁荣。
斯拉克斯大学( Syracuse University )企业学教授亚历山大•麦克科尔维( Alexander McKelvie)认为,这档电视真人秀的内容都经过精心策划。
“如果你分析这档节目,你开始会以为这是一个真人秀。但其实它更像是经过策划的,有故事提纲的节目,它向观众精心提供一定的信息,这些信息都是节目制作人和卡戴珊家族想要向观众传达的。”
卡戴珊们如何赚得百万?
本季的真人秀《与卡戴珊同行》聚焦在科勒•卡戴珊卷入的一个"丑闻"中 - 她的一个前男友据称与妹妹凯莉的一个闺密乔丁•伍兹( Jordyn Woods )有染。
在真人秀中,科勒抱怨说:“这件事搞得那么公开,真让人生气!我不能天天生活在电视上!”
而就在这期节目播出前后,凯莉与乔丁合作的一款口红品牌降价一半,很快就告售罄。
尽管凯莉在美国媒体采访中否认这是有意为之。事实是,真人秀中的“丑闻”继续发展了。
在那期节目中,观众还看到科勒正在为她的牛仔装公司做宣传,金和凯莉在一起讨论合作研发一款香水,金的丈夫说唱歌手坎耶•韦斯特( Kanye West)也参加进来谈起他自己的项目。似乎是巧合,大姐考特妮也在这时发起了她个人的生活方式博客网站 Poosh。
卡戴珊姐妹的绝大多数商业项目都是在社交网站Instagram 公布的,可以说,这个社交网站更是年轻的凯莉•詹娜商业成功的关键因素。
分析人士认为,她们利用社交网站上拥有无数追随者的商机,创立受到“粉丝”喜欢的品牌。凯莉的化妆品牌就是最好的例子。
2015年11月,当凯莉首次通过她的Instagram 帐号发布自己创立的口红品牌时,数以百万计的“粉丝”通过她的帐号直接购买,也就是说,她由此免除了市场经营成本,并直接得到用户对商品的反馈。
北卡罗来那州立大学企业学教务长助理路易斯•什茨(Lewis Sheats)说:“想想20年前,一个企业家想从20个客户那里得到反馈,他可能不得不邀请他们面谈,或将产品送给客户试验使用,他们也可能不得不站在街口询问路人。而今天在社交网站上,一个产品或仅仅是商业想法,他们就可能在几秒钟之内得到数以千计顾客的反馈。”
这档真人秀电视系列节目转眼已经开播10年有余,卡戴珊一家的财富也随之暴涨。
刚满21岁——节目开播时年仅9岁的卡戴珊家小妹凯莉•詹娜( Kylie Jenner )竟然跻身亿万富翁行列。
根据《福布斯杂志》公布的信息,凯莉身价已达10亿美元,成为真人秀明星卡戴珊家族中首富,而她的姐妹们也并不落魄,借着这档真人秀的东风,她们个个都已身家百万。
在一个追求网红的时代,卡戴珊姐妹利用电视和网络的影响竭力发展商业王国,显然她们成功了。卡戴珊姐妹在网络上的粉丝加在一起共有5.37亿之多,她们的影响力促进了她们各自商业王国的拓展和繁荣。
斯拉克斯大学( Syracuse University )企业学教授亚历山大•麦克科尔维( Alexander McKelvie)认为,这档电视真人秀的内容都经过精心策划。
“如果你分析这档节目,你开始会以为这是一个真人秀。但其实它更像是经过策划的,有故事提纲的节目,它向观众精心提供一定的信息,这些信息都是节目制作人和卡戴珊家族想要向观众传达的。”
卡戴珊们如何赚得百万?
本季的真人秀《与卡戴珊同行》聚焦在科勒•卡戴珊卷入的一个"丑闻"中 - 她的一个前男友据称与妹妹凯莉的一个闺密乔丁•伍兹( Jordyn Woods )有染。
在真人秀中,科勒抱怨说:“这件事搞得那么公开,真让人生气!我不能天天生活在电视上!”
而就在这期节目播出前后,凯莉与乔丁合作的一款口红品牌降价一半,很快就告售罄。
尽管凯莉在美国媒体采访中否认这是有意为之。事实是,真人秀中的“丑闻”继续发展了。
在那期节目中,观众还看到科勒正在为她的牛仔装公司做宣传,金和凯莉在一起讨论合作研发一款香水,金的丈夫说唱歌手坎耶•韦斯特( Kanye West)也参加进来谈起他自己的项目。似乎是巧合,大姐考特妮也在这时发起了她个人的生活方式博客网站 Poosh。
卡戴珊姐妹的绝大多数商业项目都是在社交网站Instagram 公布的,可以说,这个社交网站更是年轻的凯莉•詹娜商业成功的关键因素。
分析人士认为,她们利用社交网站上拥有无数追随者的商机,创立受到“粉丝”喜欢的品牌。凯莉的化妆品牌就是最好的例子。
2015年11月,当凯莉首次通过她的Instagram 帐号发布自己创立的口红品牌时,数以百万计的“粉丝”通过她的帐号直接购买,也就是说,她由此免除了市场经营成本,并直接得到用户对商品的反馈。
北卡罗来那州立大学企业学教务长助理路易斯•什茨(Lewis Sheats)说:“想想20年前,一个企业家想从20个客户那里得到反馈,他可能不得不邀请他们面谈,或将产品送给客户试验使用,他们也可能不得不站在街口询问路人。而今天在社交网站上,一个产品或仅仅是商业想法,他们就可能在几秒钟之内得到数以千计顾客的反馈。”
Tuesday, April 2, 2019
河南23名幼儿食物中毒事件:幼儿园被查封 投毒教师被拘
中新社郑州4月2日电 (记者 李贵刚)河南焦作一幼儿园23名幼儿食物中毒事件有了最新进展,焦作市解放区政府新闻办公室2日通报称,涉事幼儿园已被查封,投毒教师已被刑拘。
据此前媒体报道称,3月底,河南焦作解放区“萌萌学前教育(幼儿园)”部分幼儿就餐后发生呕吐、晕厥等情况。
事发后,当地警方4月1日通报该园幼儿食物中毒系该园教师投毒所致。
当地官方2日通报详情称,该园有大、中、小三个班共64名幼儿,发生中毒的均为中班幼儿。3月27日上午,该园对幼儿进行例行加餐,加餐食品为自行加工的八宝粥,约20分钟后,中班24名幼儿中有23人(1人未就餐)出现呕吐等情况,先后送医就诊。
经全力救治,目前,23名幼儿除1名症状较重送至郑州救治外,还有6名儿童留院观察治疗,其他幼儿已陆续出院。同时,当地对该园64名幼儿进行分流,55名幼儿明确分流意向,其中16人已入园就读。
当地警方2日通报称,由于该园教师和负责人需要配合案件调查和侦办,该园已被警方查封。经初步侦查,该事件系该园教师王某投放亚硝酸钠所致,王某已被刑事拘留。
据悉,4月1日,河南省政府办公厅印发了《河南省城镇小区配套幼儿园和无证幼儿园专项治理工作方案》。该方案要求,今年8月底前,各地对规定期限内未整改或整改后仍达不到基本办园条件而继续办园的,以及收到非法办学告知书后仍然招生的幼儿园,将依法进行强制查封。(完)
二是开展实践指导。开展志愿服务、主题展览、团体职业指导等实践活动,组织失业青年参观人力资源市场、技工院校和企业园区,增强职业认知。对有求职意愿的青年开展一次职业素质测评,量身定制一份“就业启航计划书”,帮助合理确定职业定位,积极就业。
三是提升就业能力。将有培训意愿的失业青年组织到职业技能提升行动中,有针对性地提供培训项目,使之至少掌握一种专项技能。对希望接受技能教育的,推荐就读职业院校、技工院校。对缺乏工作经历的,提供就业见习机会,提升岗位适应能力。
四是扶持自主创业。组织有创业意愿的失业青年参观创业园区、孵化基地、众创空间,感受创业氛围。开展创业创新培训,帮助提升创业能力。为符合条件的失业青年提供创业担保贷款、一次性创业补贴、场租补贴等支持。
五是实施托底帮扶。将建档立卡贫困家庭、城乡低保家庭、零就业家庭和残疾失业青年作为重点援助对象,提供专门的职业指导和心理咨询服务,组织专场招聘活动,优先向企业推荐。开展调查回访,跟踪了解就业情况、工作生活难题、意见诉求等,积极帮助解决,促进稳定就业。
据此前媒体报道称,3月底,河南焦作解放区“萌萌学前教育(幼儿园)”部分幼儿就餐后发生呕吐、晕厥等情况。
事发后,当地警方4月1日通报该园幼儿食物中毒系该园教师投毒所致。
当地官方2日通报详情称,该园有大、中、小三个班共64名幼儿,发生中毒的均为中班幼儿。3月27日上午,该园对幼儿进行例行加餐,加餐食品为自行加工的八宝粥,约20分钟后,中班24名幼儿中有23人(1人未就餐)出现呕吐等情况,先后送医就诊。
经全力救治,目前,23名幼儿除1名症状较重送至郑州救治外,还有6名儿童留院观察治疗,其他幼儿已陆续出院。同时,当地对该园64名幼儿进行分流,55名幼儿明确分流意向,其中16人已入园就读。
当地警方2日通报称,由于该园教师和负责人需要配合案件调查和侦办,该园已被警方查封。经初步侦查,该事件系该园教师王某投放亚硝酸钠所致,王某已被刑事拘留。
据悉,4月1日,河南省政府办公厅印发了《河南省城镇小区配套幼儿园和无证幼儿园专项治理工作方案》。该方案要求,今年8月底前,各地对规定期限内未整改或整改后仍达不到基本办园条件而继续办园的,以及收到非法办学告知书后仍然招生的幼儿园,将依法进行强制查封。(完)
二是开展实践指导。开展志愿服务、主题展览、团体职业指导等实践活动,组织失业青年参观人力资源市场、技工院校和企业园区,增强职业认知。对有求职意愿的青年开展一次职业素质测评,量身定制一份“就业启航计划书”,帮助合理确定职业定位,积极就业。
三是提升就业能力。将有培训意愿的失业青年组织到职业技能提升行动中,有针对性地提供培训项目,使之至少掌握一种专项技能。对希望接受技能教育的,推荐就读职业院校、技工院校。对缺乏工作经历的,提供就业见习机会,提升岗位适应能力。
四是扶持自主创业。组织有创业意愿的失业青年参观创业园区、孵化基地、众创空间,感受创业氛围。开展创业创新培训,帮助提升创业能力。为符合条件的失业青年提供创业担保贷款、一次性创业补贴、场租补贴等支持。
五是实施托底帮扶。将建档立卡贫困家庭、城乡低保家庭、零就业家庭和残疾失业青年作为重点援助对象,提供专门的职业指导和心理咨询服务,组织专场招聘活动,优先向企业推荐。开展调查回访,跟踪了解就业情况、工作生活难题、意见诉求等,积极帮助解决,促进稳定就业。
Tuesday, March 26, 2019
耿爽:中方对泛美行决定取消成都年会深表遗憾
中新网北京3月26日电 (张蔚然 宋蕙)中国外交部发言人耿爽3月26日在例行记者会上表示,中方对泛美行决定取消成都年会深表遗憾。中方相信,我们与泛美行和广大拉美国家的合作不会受到干扰,对未来加强彼此间的合作依然充满信心。
耿爽当天表示,泛美开发银行第60届理事会年会原定于3月26日至31日在成都举行。中方作为承办国,对此次年会高度重视,作了大量筹备工作,希望与各方共同努力,将年会开成团结、合作、共赢的会议,取得圆满成功。包括中方在内的绝大多数泛美行成员国也都认为,泛美行年会是金融界的会议,应该聚焦金融合作,不是讨论敏感政治议题的合适场合,但是个别国家持续搅动委内瑞拉这一敏感政治议题,在各成员国存在严重分歧的情况下,在年会临近时仓促通过瓜伊多任命的新理事和执董,并坚持推动其来华与会。
耿爽说,中方在委内瑞拉问题上的立场一贯、明确。我们主张各方应该恪守联合国宪章的宗旨和原则,遵循国际法和国际关系基本准则,不干涉委内瑞拉内政。虽然瓜伊多提名的理事通过了泛美行表决程序,但瓜本人并非经合法程序产生的总统,缺乏合法性,中方难以允许其代表来华参会。更迭委在泛美行的代表,既无助于委问题的解决,也破坏了泛美行年会的氛围,干扰了会议的筹备进程。
耿爽指出,为了保证年会顺利进行,中方表明对委代表与会问题的审慎态度,也提出了合情合理的解决方案,并且持续与有关各方深入沟通,协调立场,呼吁各方秉持友好合作的办会初心,避免将会议政治化,这从根本上符合各方的共同利益。中方提出的意见和方案,体现了对泛美行和各成员的尊重,也体现了中方作为东道国希望成功办会的诚意,是负责任的表现。然而个别国家不顾年会宗旨,也不顾中方的立场和关切,也不顾东道国的真诚努力,强人所难,坚持操弄委内瑞拉问题,强行让瓜伊多代表来参会,导致年会无法按计划顺利举行,这是各方都不愿看到的,责任不在中方。
耿爽说,中方对泛美行决定取消成都年会深表遗憾。据他了解,绝大多数泛美行成员国都认同中方的主张,认为年会应该聚焦金融合作,不应该受到争议性政治议题的干扰,也非常清楚究竟是谁在阻挠会议的成功举办。中方相信,我们与泛美行和广大拉美国家的合作不会受到干扰,对未来加强彼此间的合作依然充满信心。(完)
《报告》显示,韩国、中国台湾、新加坡和中国香港综合竞争力居前4位,具有领先亚洲的国际竞争优势。日本、以色列、澳大利亚、新西兰、中国、阿联酋分列第5位至第10位。中国仍保持上年度第9位的排名,竞争地位稳固,商业行政效率和社会发展水平进步最大。
2018年中国实际使用外资数额创历史新高
《新兴经济体发展2019年度报告》指出,2018年,阿根廷、巴西、中国、印度、印度尼西亚、韩国、墨西哥、俄罗斯、沙特阿拉伯、南非和土耳其等“新兴11国”(E11)经济增长率略微放缓。据国际货币基金组织的估计数据加权计算,2018年E11的国内生产总值增长率约为5.1%,略低于上年5.2%的增长率。
中国国际经济交流中心美欧所副所长、研究员张焕波(中)发言。南海网记者 刘洋摄
《报告》显示,2018年E11多数国家就业形势好转,收入水平呈改善势头,但物价有所上升,通胀压力加大。同时,贸易增长动力显著增强,外商直接投资逆势增长。例如,2018年中国实际使用外资1349.7亿美元,同比增长3%,创历史新高。
耿爽当天表示,泛美开发银行第60届理事会年会原定于3月26日至31日在成都举行。中方作为承办国,对此次年会高度重视,作了大量筹备工作,希望与各方共同努力,将年会开成团结、合作、共赢的会议,取得圆满成功。包括中方在内的绝大多数泛美行成员国也都认为,泛美行年会是金融界的会议,应该聚焦金融合作,不是讨论敏感政治议题的合适场合,但是个别国家持续搅动委内瑞拉这一敏感政治议题,在各成员国存在严重分歧的情况下,在年会临近时仓促通过瓜伊多任命的新理事和执董,并坚持推动其来华与会。
耿爽说,中方在委内瑞拉问题上的立场一贯、明确。我们主张各方应该恪守联合国宪章的宗旨和原则,遵循国际法和国际关系基本准则,不干涉委内瑞拉内政。虽然瓜伊多提名的理事通过了泛美行表决程序,但瓜本人并非经合法程序产生的总统,缺乏合法性,中方难以允许其代表来华参会。更迭委在泛美行的代表,既无助于委问题的解决,也破坏了泛美行年会的氛围,干扰了会议的筹备进程。
耿爽指出,为了保证年会顺利进行,中方表明对委代表与会问题的审慎态度,也提出了合情合理的解决方案,并且持续与有关各方深入沟通,协调立场,呼吁各方秉持友好合作的办会初心,避免将会议政治化,这从根本上符合各方的共同利益。中方提出的意见和方案,体现了对泛美行和各成员的尊重,也体现了中方作为东道国希望成功办会的诚意,是负责任的表现。然而个别国家不顾年会宗旨,也不顾中方的立场和关切,也不顾东道国的真诚努力,强人所难,坚持操弄委内瑞拉问题,强行让瓜伊多代表来参会,导致年会无法按计划顺利举行,这是各方都不愿看到的,责任不在中方。
耿爽说,中方对泛美行决定取消成都年会深表遗憾。据他了解,绝大多数泛美行成员国都认同中方的主张,认为年会应该聚焦金融合作,不应该受到争议性政治议题的干扰,也非常清楚究竟是谁在阻挠会议的成功举办。中方相信,我们与泛美行和广大拉美国家的合作不会受到干扰,对未来加强彼此间的合作依然充满信心。(完)
《报告》显示,韩国、中国台湾、新加坡和中国香港综合竞争力居前4位,具有领先亚洲的国际竞争优势。日本、以色列、澳大利亚、新西兰、中国、阿联酋分列第5位至第10位。中国仍保持上年度第9位的排名,竞争地位稳固,商业行政效率和社会发展水平进步最大。
2018年中国实际使用外资数额创历史新高
《新兴经济体发展2019年度报告》指出,2018年,阿根廷、巴西、中国、印度、印度尼西亚、韩国、墨西哥、俄罗斯、沙特阿拉伯、南非和土耳其等“新兴11国”(E11)经济增长率略微放缓。据国际货币基金组织的估计数据加权计算,2018年E11的国内生产总值增长率约为5.1%,略低于上年5.2%的增长率。
中国国际经济交流中心美欧所副所长、研究员张焕波(中)发言。南海网记者 刘洋摄
《报告》显示,2018年E11多数国家就业形势好转,收入水平呈改善势头,但物价有所上升,通胀压力加大。同时,贸易增长动力显著增强,外商直接投资逆势增长。例如,2018年中国实际使用外资1349.7亿美元,同比增长3%,创历史新高。
Wednesday, March 13, 2019
#Balakot में भारत को एयर स्ट्राइक से क्या मिला
पिछले महीने 14 फ़रवरी को भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा ज़िले में सीआरपीएफ़ के एक काफ़िले पर जैश-ए-मोहम्मद के आत्मघाती हमले में 40 जवानों के मारे जाने के बाद भारत ने 26 फ़रवरी को पाकिस्तान में चरमपंथी संगठनों के ठिकानों को निशाने पर लिया था.
भारत ने यह कार्रवाई पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तुनख़्वा प्रांत के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों पर की थी.
कहा जा रहा है कि भारत ने यह हमला मिराज 2000 लड़ाकू विमान से किया था और ये 12 की संख्या में गए थे. इससे पहले 1971 के युद्ध में भारतीय सेना पाकिस्तानी सीमा में घुसी थी.
24 घंटे के भीतर ही पाकिस्तान ने 27 फ़रवरी को या तो एफ़-16 या जेएफ़-17 से एक भारतीय मिग-21 लड़ाकू विमान मार गिराया.
कहा जा रहा है कि पाकिस्तानी एयरक्राफ़्ट नियंत्रण रेखा के पार भारत प्रशासित कश्मीर में घुस आए थे और बमबारी की थी. भारत ने ये भी दावा किया कि उसने पाकिस्तान के एफ़-16 लड़ाकू विमान को मार गिराया था.
आतंकवाद से लड़ने के लिए वायुसेना का इस्तेमाल करने का भारत के फ़ैसले को अहम माना जा रहा है. लेकिन पाकिस्तान की तरफ़ से 24 घंटे के भीतर मिले जवाब के बाद रभारत का यह फ़ैसला कितना उचित हा?
पाकिस्तान की जवाबी कार्रवाई में भारत का एक मिग गिरा और एक पायलट को गिरफ़्तार कर लिया.
जाने-माने रक्षा विशेषज्ञ राहुल बेदी कहते हैं अगर चुनाव के लिहाज से देखें तो मोदी सरकार के हक़ में यह फ़ैसला जाता दिख रहा है लेकिन सुरक्षा रणनीति के नज़रिए से देखें तो यह बहस का विषय है.
राहुल बेदी कहते हैं, ''पाकिस्तान ने भारत को 24 घंटे के भीतर ही जवाब ज़रूर दिया लेकिन भारत के भीतर लोगों की धारणा मोदी के पक्ष में रही. लेकिन सुरक्षा की रणनीति के नज़रिए से देखें तो यह बहुत ख़तरनाक मालूम पड़ता है. दो परमाणु शक्ति संपन्न देश एक दूसरे की सीमा में फाइटर प्लेन के साथ घुसे. पिछले सात दशक में मुझे ऐसा कोई वाक़या नहीं याद आ रहा है. मोदी ने जो क़दम उठाया है और इस पर आगे बढ़ते रहे तो सोचकर ही डर लगता है.''
राहुल बेदी का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी ने आतंकवाद के ख़िलाफ़ एयर स्ट्राइक करके भी देख लिया लेकिन इसके नतीजे क्या मिले अभी तक साफ़ नहीं है.
बेदी कहते हैं, ''36 घंटे के भीतर भारतीय वायुसेना के पायलट का भारत आना मोदी के पक्ष में गया, लेकिन अगर फिर आतंकी हमला हुआ तब मोदी के पास क्या विकल्प हैं? मुझे कोई विकल्प नहीं दिखता है. भारत की एयर स्ट्राइक का जवाब पाकिस्तान ने भी वैसै ही दिया. ऐसे में भारत फिर एयर स्ट्राइक करेगा, ऐसा नहीं लगता. अभी भारत की वायुसेना भले पाकिस्तान से थोड़ी मज़बूत है लेकिन आने वाले तीन-चार सालों में ऐसा नहीं रहेगा. अब भारत के लिए यह अहम सवाल है कि फिर से आतंकी हमला हुआ तो भारत क्या करेगा?''
भारत में वायुसेना के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है. भारत जिन लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल कर रहा है उसकी तकनीक वक़्त के साथ पुरानी पड़ गई है. रक्षा विशेषज्ञ मिग को भारत के आसामान का ताबूत कहते हैं.
ऐसे में भारत की वायुसेना पाकिस्तान को किस हद तक चुनौती देगी? यहां तक कि भारत के सेना प्रमुख ढाई मोर्चे से युद्ध की बात करते हैं. मतलब पाकिस्तान के साथ जंग की स्थिति बनी तो चीन के रुख़ को लेकर भारत की चिंता बनी रहती है.
भारतीय वायुसेना के पास महज 32 स्क्वैड्रन हैं जबकि सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि कम से कम 42 स्क्वैड्रन होने चाहिए. 32 में से भी कई स्क्वैड्रन लड़ाकू विमानों की कमी से जूझ रहे हैं. एक स्क्वैड्रन पर कम से कम 16 से 18 लड़ाकू विमान होने चाहिए.
मिग-21 में 1960 के दशक की सोवियत संघ वाली तकनीक है और आज भी इसका इस्तेमाल करता है. भारत के 6 स्क्वैड्रन आज भी मिग-21 के सहारे हैं. भारतीय वायुसेना ने अपने घर में बनाए लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) को भी शामिल किया है.
फ़्रांस के साथ रफ़ाल लड़ाकू विमानों का सौदा भी भारतीय एयरफ़ोर्स के अहम है. एलसीए को बनाने में भारत ने कम से कम तीन दशक के वक़्त लिए हैं. मार्च 2019 से सिर्फ़ 16 एलीसए एयर फ़ोर्स में शामिल होंगे. अब भी भारतीय वायुसेना अडवांस फाइटर प्लेन के लिए जूझ रही है.
भारत ने यह कार्रवाई पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तुनख़्वा प्रांत के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों पर की थी.
कहा जा रहा है कि भारत ने यह हमला मिराज 2000 लड़ाकू विमान से किया था और ये 12 की संख्या में गए थे. इससे पहले 1971 के युद्ध में भारतीय सेना पाकिस्तानी सीमा में घुसी थी.
24 घंटे के भीतर ही पाकिस्तान ने 27 फ़रवरी को या तो एफ़-16 या जेएफ़-17 से एक भारतीय मिग-21 लड़ाकू विमान मार गिराया.
कहा जा रहा है कि पाकिस्तानी एयरक्राफ़्ट नियंत्रण रेखा के पार भारत प्रशासित कश्मीर में घुस आए थे और बमबारी की थी. भारत ने ये भी दावा किया कि उसने पाकिस्तान के एफ़-16 लड़ाकू विमान को मार गिराया था.
आतंकवाद से लड़ने के लिए वायुसेना का इस्तेमाल करने का भारत के फ़ैसले को अहम माना जा रहा है. लेकिन पाकिस्तान की तरफ़ से 24 घंटे के भीतर मिले जवाब के बाद रभारत का यह फ़ैसला कितना उचित हा?
पाकिस्तान की जवाबी कार्रवाई में भारत का एक मिग गिरा और एक पायलट को गिरफ़्तार कर लिया.
राहुल बेदी कहते हैं, ''पाकिस्तान ने भारत को 24 घंटे के भीतर ही जवाब ज़रूर दिया लेकिन भारत के भीतर लोगों की धारणा मोदी के पक्ष में रही. लेकिन सुरक्षा की रणनीति के नज़रिए से देखें तो यह बहुत ख़तरनाक मालूम पड़ता है. दो परमाणु शक्ति संपन्न देश एक दूसरे की सीमा में फाइटर प्लेन के साथ घुसे. पिछले सात दशक में मुझे ऐसा कोई वाक़या नहीं याद आ रहा है. मोदी ने जो क़दम उठाया है और इस पर आगे बढ़ते रहे तो सोचकर ही डर लगता है.''
राहुल बेदी का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी ने आतंकवाद के ख़िलाफ़ एयर स्ट्राइक करके भी देख लिया लेकिन इसके नतीजे क्या मिले अभी तक साफ़ नहीं है.
बेदी कहते हैं, ''36 घंटे के भीतर भारतीय वायुसेना के पायलट का भारत आना मोदी के पक्ष में गया, लेकिन अगर फिर आतंकी हमला हुआ तब मोदी के पास क्या विकल्प हैं? मुझे कोई विकल्प नहीं दिखता है. भारत की एयर स्ट्राइक का जवाब पाकिस्तान ने भी वैसै ही दिया. ऐसे में भारत फिर एयर स्ट्राइक करेगा, ऐसा नहीं लगता. अभी भारत की वायुसेना भले पाकिस्तान से थोड़ी मज़बूत है लेकिन आने वाले तीन-चार सालों में ऐसा नहीं रहेगा. अब भारत के लिए यह अहम सवाल है कि फिर से आतंकी हमला हुआ तो भारत क्या करेगा?''
भारत में वायुसेना के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है. भारत जिन लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल कर रहा है उसकी तकनीक वक़्त के साथ पुरानी पड़ गई है. रक्षा विशेषज्ञ मिग को भारत के आसामान का ताबूत कहते हैं.
ऐसे में भारत की वायुसेना पाकिस्तान को किस हद तक चुनौती देगी? यहां तक कि भारत के सेना प्रमुख ढाई मोर्चे से युद्ध की बात करते हैं. मतलब पाकिस्तान के साथ जंग की स्थिति बनी तो चीन के रुख़ को लेकर भारत की चिंता बनी रहती है.
भारतीय वायुसेना के पास महज 32 स्क्वैड्रन हैं जबकि सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि कम से कम 42 स्क्वैड्रन होने चाहिए. 32 में से भी कई स्क्वैड्रन लड़ाकू विमानों की कमी से जूझ रहे हैं. एक स्क्वैड्रन पर कम से कम 16 से 18 लड़ाकू विमान होने चाहिए.
मिग-21 में 1960 के दशक की सोवियत संघ वाली तकनीक है और आज भी इसका इस्तेमाल करता है. भारत के 6 स्क्वैड्रन आज भी मिग-21 के सहारे हैं. भारतीय वायुसेना ने अपने घर में बनाए लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) को भी शामिल किया है.
फ़्रांस के साथ रफ़ाल लड़ाकू विमानों का सौदा भी भारतीय एयरफ़ोर्स के अहम है. एलसीए को बनाने में भारत ने कम से कम तीन दशक के वक़्त लिए हैं. मार्च 2019 से सिर्फ़ 16 एलीसए एयर फ़ोर्स में शामिल होंगे. अब भी भारतीय वायुसेना अडवांस फाइटर प्लेन के लिए जूझ रही है.
Thursday, February 21, 2019
毛泽东前秘书李锐告别仪式惹争议,历史资料待公开
曾担任毛泽东政治秘书的中共改革派代表人物李锐于上周六在北京离世。对于如何举行告别仪式成了中共当局与其长女李南央僵持的焦点。
由中共组织的李锐遗体告别仪式周三(2月20日)在北京市八宝山殡仪馆举行。但在美国的李南央表示不会参加仪式,称其背离了她父亲“不开追悼会,不进八宝山,不盖党旗”的意愿。
李南央表示会以自己的方式悼念父亲,将在4月公开李锐生前捐献给美国档案馆的所有日记、工作笔记等历史资料。
争议缘何起
李锐生前是中国共产党正部级干部。通常,当局为重要国家干部举行告别仪式之前,会安排组织部人员与家属协商。双方达成一致后,按照干部的级别严格执行仪式的规格。对于出席领导的级别、哪位领导赠送花圈、花圈的大小、如何对其评价等都要严格要求。但是,直至截稿,当局对这位公开提倡民主宪政的中共党员逝世一事缄口不言。中国大陆网站和社交媒体上关于李锐逝世的消息也遭到删除。
BBC中文致电李锐生前居所,得到证实,其遗体告别仪式2月20日在北京市八宝山殡仪馆举行。李南央在周二接受BBC中文网的访问时说, “这违背了我父亲的意愿。我用不参加追悼会的形式表示抗议。”
李南央在一份声明中写道,“李锐是个人,是个在共产党的铁腕统治下保持了独立的头脑,宣讲常识的有着真性情的人。……李锐自诩为独立思考的知识份子,那面镰刀、斧头的党旗上没有他的位置。”
她特别强调,李锐的这种意愿并非遗嘱。“他是通过逐年逐月的聊天向我表达的。没有文字的遗嘱,也没有录音的遗嘱,就是一种意愿。”
李南央在声明中提供了李锐的日记原件照片证实其父亲的意愿。李锐在1996年3月14日写道,“今生只缺一挥手,告别无须八宝山。请问骨灰何处撒?楼前树底作肥源。”他还在2011年7月9日的日记中提到与朋友萧柏春的谈话。最后一句写道,“党旗镰刀、斧头,就是不重视知识和知识分子。”
在中国的传统习俗中,人逝世后由其配偶和子女操办葬礼。对于李南央不参加其父亲的告别仪式,有人认为是不尽孝的表现。但李南央回应说,“我不需要顾及世人怎样看我,但是我需要能够面对父亲,面对自己。我知道父亲绝对不能接受将他定位于一个共产党的正部级干部进行追悼,我相信父亲在天有灵,一定会对那面盖着染满人的鲜血的腥红的党旗下的李锐恸哭长啸。”
BBC中文尝试与李锐遗孀张玉珍取得联系,未有结果。19日晚,一位男士的声音告诉BBC中文,对于李南央不参加告别仪式表示无奈。但未能对李锐的意愿表示回应。
享年101岁的李锐生前政治生涯起伏,晚年越发敢言,其离世在中国网络上激起众多人士自发悼念。独立记者高瑜在推特上表示,“中国堵不住一位百岁老人的嘴,因为专制战胜不了一个人对思想和良知的忠贞”。她还说,国保和警察已经在18日中午到其家中,阻止她参加周三的告别仪式。
李南央用自己的方式祭奠父亲。她将于4月李锐冥旦前,在胡佛研究所(The Hoover Institution on War, Revolution, and Peace)介绍李锐留给世人的东西。她对BBC中文说,“这是一个比较正式的仪式,是我对我父亲的祭奠,也完成了我父亲的愿望。他认为胡佛认可了他的历史地位,认可了资料的历史价值。”
李锐把他在1935年到2018年期间所有的日记原件、信件、以及他参加庐山会议时和参加土改时的工作笔记都捐给了位于美国斯坦福大学的胡佛研究所。李南央已经把手记部分整理成电子版,录入的内容约有一千万字,可以按日期检索。
她说,在录入资料时,“一个字都没改,一个字都没删,完全是原文。”
李南央说,李锐在日记里记录的多是事件,基本没有对感情的抒发和对问题的认识。她举例,日记里记录了中共的“批条子文化”。“日记里批的条子不下上千个。”谁批的、何时批的、批的数额等都一一在案。
“他日记里有非常多的内容能反应出来,中国的所谓改革开放根本不是市场经济,还是条子经济,还是领导人说了算”,李南央说。
由中共组织的李锐遗体告别仪式周三(2月20日)在北京市八宝山殡仪馆举行。但在美国的李南央表示不会参加仪式,称其背离了她父亲“不开追悼会,不进八宝山,不盖党旗”的意愿。
李南央表示会以自己的方式悼念父亲,将在4月公开李锐生前捐献给美国档案馆的所有日记、工作笔记等历史资料。
争议缘何起
李锐生前是中国共产党正部级干部。通常,当局为重要国家干部举行告别仪式之前,会安排组织部人员与家属协商。双方达成一致后,按照干部的级别严格执行仪式的规格。对于出席领导的级别、哪位领导赠送花圈、花圈的大小、如何对其评价等都要严格要求。但是,直至截稿,当局对这位公开提倡民主宪政的中共党员逝世一事缄口不言。中国大陆网站和社交媒体上关于李锐逝世的消息也遭到删除。
BBC中文致电李锐生前居所,得到证实,其遗体告别仪式2月20日在北京市八宝山殡仪馆举行。李南央在周二接受BBC中文网的访问时说, “这违背了我父亲的意愿。我用不参加追悼会的形式表示抗议。”
李南央在一份声明中写道,“李锐是个人,是个在共产党的铁腕统治下保持了独立的头脑,宣讲常识的有着真性情的人。……李锐自诩为独立思考的知识份子,那面镰刀、斧头的党旗上没有他的位置。”
她特别强调,李锐的这种意愿并非遗嘱。“他是通过逐年逐月的聊天向我表达的。没有文字的遗嘱,也没有录音的遗嘱,就是一种意愿。”
李南央在声明中提供了李锐的日记原件照片证实其父亲的意愿。李锐在1996年3月14日写道,“今生只缺一挥手,告别无须八宝山。请问骨灰何处撒?楼前树底作肥源。”他还在2011年7月9日的日记中提到与朋友萧柏春的谈话。最后一句写道,“党旗镰刀、斧头,就是不重视知识和知识分子。”
在中国的传统习俗中,人逝世后由其配偶和子女操办葬礼。对于李南央不参加其父亲的告别仪式,有人认为是不尽孝的表现。但李南央回应说,“我不需要顾及世人怎样看我,但是我需要能够面对父亲,面对自己。我知道父亲绝对不能接受将他定位于一个共产党的正部级干部进行追悼,我相信父亲在天有灵,一定会对那面盖着染满人的鲜血的腥红的党旗下的李锐恸哭长啸。”
BBC中文尝试与李锐遗孀张玉珍取得联系,未有结果。19日晚,一位男士的声音告诉BBC中文,对于李南央不参加告别仪式表示无奈。但未能对李锐的意愿表示回应。
享年101岁的李锐生前政治生涯起伏,晚年越发敢言,其离世在中国网络上激起众多人士自发悼念。独立记者高瑜在推特上表示,“中国堵不住一位百岁老人的嘴,因为专制战胜不了一个人对思想和良知的忠贞”。她还说,国保和警察已经在18日中午到其家中,阻止她参加周三的告别仪式。
李南央用自己的方式祭奠父亲。她将于4月李锐冥旦前,在胡佛研究所(The Hoover Institution on War, Revolution, and Peace)介绍李锐留给世人的东西。她对BBC中文说,“这是一个比较正式的仪式,是我对我父亲的祭奠,也完成了我父亲的愿望。他认为胡佛认可了他的历史地位,认可了资料的历史价值。”
李锐把他在1935年到2018年期间所有的日记原件、信件、以及他参加庐山会议时和参加土改时的工作笔记都捐给了位于美国斯坦福大学的胡佛研究所。李南央已经把手记部分整理成电子版,录入的内容约有一千万字,可以按日期检索。
她说,在录入资料时,“一个字都没改,一个字都没删,完全是原文。”
李南央说,李锐在日记里记录的多是事件,基本没有对感情的抒发和对问题的认识。她举例,日记里记录了中共的“批条子文化”。“日记里批的条子不下上千个。”谁批的、何时批的、批的数额等都一一在案。
“他日记里有非常多的内容能反应出来,中国的所谓改革开放根本不是市场经济,还是条子经济,还是领导人说了算”,李南央说。
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